मित्र धर्म का पालन भगवान श्रीकृष्ण से सीखना चाहिए : डाॅ.अनुरंजिका चतुर्वेदी

वाराणसी

संस्कृति सेवा न्यास द्वारा पुरुषोत्तम मास के अन्तर्गत श्रीमद्भागवत कथा ज्ञानयज्ञ के सप्तम दिवस डॉ. अनुरंजिका चतुर्वेदी नें कहा कि राम और श्याम दोनों ही दो युगों में पालनहार विष्णु के अवतार हैं। किन्तु राम की करनी अनुकरणीय है और श्याम की कथनी।

कृष्ण आकर्षण के केन्द्र हैं और चोर भी हैं। बाल्यावस्था से ही चोरी करते रहे, किसी की दही तो किसी का दूध और किसी का माखन। किसी का चीर (दुकूल) चुराते हैं तो किसी का चित्त और तो और भक्तों के पाप भी चुराते हैं इसीलिए व्यास जी ने कहा – “पापाति चौरं शिरसा नमामि”।

कृष्ण के चरित्र से मित्र धर्म का निर्वहन कैसे किया जाता है यह आज के परिवेश में सीखना चाहिए। आज यदि कोई निर्धन रिश्तेदार होता है तो उसे लोग सामाजिक उत्सव में अपने घर बुलाने से हिचकिचाते हैं। मित्र की तो बात ही अलग है। किन्तु कृष्ण शून्य को शिखर पर बैठाकर आर्द्रित करते हैं। उनकी दृष्टि में वस्त्र, वेशभूषा, कद- काठी मायने नहीं रखती, अपितु हृदयगत भाव महत्वपूर्ण है। वह चाहते तो सुदामा जी को लौटते वक्त उनके हाथों में अपार धन-संपदा दे सकते थे। अपने राज्यकर्मियों से उनके साथ भेज भी सकते थे। जिसे लोग आश्चर्यचकित नेत्रों से देखते परन्तु लोकदृष्टि में सभी यह जान जाते कि इनका गरीब मित्र मदद माँगने आया था और यह उसकी मदद कर रहे हैं।

कथारंभ में व्यास पूजन नई दिल्ली से पधारी गीता संसनवाल नें व समापन पर आरती डॉ. उमाशंकर चतुर्वेदी “कंचन” नें सपत्नीक किया।

इस दौरान मधु संसनवाल, कनौदा, हरियाणा की नेहा संसनवाल, उमेश तिवारी, उषा तिवारी, निशांत नीरज, चेतना श्रीवास्तव, डीपीसिंह, प्रद्युम्न तिवारी, शशिकांत शुक्ल, अनामिका तिवारी, मनीषा, गीता संसनवाल, ज्योति छिकारा, प्रतिभा सिंह, डा.अभिषेक, आचार्य अविनाश चतुर्वेदी, श्रीनाथ तिवारी,वन्दना सिंह, आनन्द जी, मार्कण्डेय द्विवेदी, अनीता सिंह ,नेहा मिश्रा सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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