भगवान श्रीकृष्ण का साक्षात वांग्मय है श्रीमद्भागवत महापुराण : डाॅ.अनुरंजिका चतुर्वेदी

वाराणसी

सामाजिक सेवा के लिए कटिबद्ध संस्कृति सेवा न्यास द्वारा पुरुषोत्तम मास के अन्तर्गत साकेतनगर , संकटमोचन में आयोजित श्रीमद्भागवत महापुराण कथा ज्ञान-यज्ञ के तृतीय दिवस की कथा में मंचासीन व्यास डॉ.अनुरंजिका चतुर्वेदी नें परीक्षित द्वारा किए गये प्रश्न-“मृयमाण व्यक्ति को क्या करना चाहिए ?” का विवेचन करते हुए बताया कि-” प्रत्येक व्यक्ति को राग-द्वेष से विरत होकर,महर्षि पतंजलि द्वारा निर्देशित सूत्र “योगश्चित्तवृत्ति निरोध:” का अनुकरण करते हुए आसन,ध्यान, धारणा,समाधि,यम,नियम, प्रत्याहार के अन्तर्गत अत्यंत संयमित जीवन जीने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इच्छाओं पर अंकुश लगाते हुए जितेन्द्रिय बनने का प्रयास करना चाहिए और मानव जीवन को सार्थक बनाने हेतु ईश्वरीय आराधना-साधना में अपने को व्यस्त रखते हुए प्रति पल सचेष्ट रहते हुए अपकर्मों से बचने का प्रयास करना चाहिए।

कथा को विस्तार देते हुए कथा व्यास नें कहा कि-‌ एक बार परब्रह्म को एक से अनेक होने की इच्छा हुई जिससे सृष्टि का संचालन हो सके,उसी क्रम में नारायण नें मनु शतरूपा के माध्यम से इस संसार के माया-जाल का निर्माण किया और अपनी शक्तिस्वरूपा भगवती माया की माया से संसार को आच्छादित कर दिया। इसी लिए शास्त्रों में कहा गया है -“विष्णोर्माया भगवती यया सम्मोहितं जगत्”। अर्थात यह सम्पूर्ण चराचर उसी माया में संलिप्त है।

कथा के आरंभ में व्यास पूजन गोपालगंज बिहार से पधारी प्रतिभा सिंह द्वारा किया गया तथा विराम आरती डॉ सविता चतुर्वेदी नें उतारा। इस दौरान जौनपुर के समाजसेवी सपत्नीक शशिकांत शुक्ल, राँची बिहार की रश्मि मिश्रा , मऊ की माया उपाध्याय, सुशील उपाध्याय, वाराणसी से वेदप्रकाश सिंह, डी.पी.सिंह, आचार्य अविनाश चतुर्वेदी, ज्योतिषाचार्य नेहा मिश्रा, श्रीनाथ तिवारी, नीरज सहित तमाम लोग मौजूद रहे।

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