वाराणसी
सामाजिक सेवा के लिए कटिबद्ध संस्कृति सेवा न्यास द्वारा पुरुषोत्तम मास के अन्तर्गत साकेतनगर संकटमोचन में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान-यज्ञ के चतुर्थ दिवस भागवत मर्मज्ञ डॉ.अनुरंजिका चतुर्वेदी नें पुरंजन रूपी जीव तथा अभिज्ञात रूपी ब्रह्म के आख्यान का वर्णन करते हुए बताया कि पुरंजन के मन में इच्छा हुई कि चलो कुछ दिन घूमकर आता हूंँ,और पर्यटन पर निकल जाता है। परन्तु वह भ्रमण के दौरान जिस नगर में जाता है, उस विशिष्ट नगर के भौतिक सौन्दर्य को देख वहीं कुछ दिन रहने का विचार बना लेता है।

फिर माया के वशीभूत होकर उसी नगर में अपनी गृहस्थी बसा लेता है। परिणामस्वरूप अपने वास्तविक नगर को भूल जाता है। किन्तु कालान्तर में एक वक्त आता है जब उसे अभिज्ञात नामक मित्र के याद दिलाने पर अपने वास्तविक पुराने नगर की याद आती है, तो सिर्फ पछताता है कि मैं यहांँ क्या करने आया था और क्या करने लगा। ठीक वही स्थिति हम सब मनुष्यों की है। हम सब पुरंजन हैं,और अभिज्ञात वह परब्रह्म है। हम सब कुछ दिनों के लिए इस संसार रूपी नगर में भ्रमणार्थ आए हैं। मगर यहाँ आकर इसे ही सब कुछ मान बैठे हैं।
किन्तु अभिज्ञात रूपी ईश्वर द्वारा पुराने नगर की याद दिलाने पर पछताने लगते हैं कि यहांँ तो जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति हेतु ईश्वरीय आराधना में लिप्त होकर मानव योनि को सफल बनाने आये थे परन्तु माया में उलझकर समय और जीवन दोनों गँवा बैठे।
कथा के बीच-बीच में श्रोताओं को प्रसंगानुसार भजनों से रससिक्त करनेवालों में संतोष तिवारी हारमोनियम सहित गायन, राजीव झा तबला तथा आर्गन पर चन्द्रप्रकाश रहे। कथारंभ में व्यास पूजन सुशीला यादव तथा विराम की आरती माया उपाध्याय द्वारा किया गया।
इस दौरान प्रमुख रूप से अभिनव चतुर्वेदी,डॉ.संजीव शर्मा, डीपी सिंह, शिमला त्रिपाठी, प्रगति द्विवेदी,शशिकांत शुक्ल, डॉ. अभिषेक,श्रीनाथ तिवारी, पं.आनंद तिवारी,नीरज मिश्र, गीता संसनवाल, ज्योति छिकारा, श्याम कुमारी पाठक, मार्कण्डेय जी, आनन्द जी, सहित तमाम लोग मौजूद रहे।


