सुदामा चरित्र एवं भगवान श्री कृष्ण गोलोक गमन की कथा सुन भावविभोर हुए श्रोता

हर्रैया (बस्ती)

नगर पंचायत के वार्ड नंबर 13 मंगल पाण्डेय नगर भदासी में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के विश्राम दिवस की कथा सुनाते हुए व्यास पंडित हरिओम कृष्ण जी महाराज नें कहा कि भगवान केवल प्रेम के भूखे हैं। सच्चे मित्र और भक्त को वे बिना माँगे सब कुछ दे देते हैं। दरिद्रता भगवान की भक्ति में बाधा नहीं है।

सुदामा चरित्र का वर्णन करते हुए व्यास ने कहा कि सुदामा भगवान श्रीकृष्ण के बचपन के मित्र थे। वे संदीपनि मुनि के आश्रम में श्रीकृष्ण के साथ पढ़ते थे। बड़े होने पर सुदामा जी ब्राह्मण हुए और अत्यंत गरीबी में जीवन बिताते थे। उनकी पत्नी सुशीला बहुत पतिव्रता थीं। भूख से बच्चे रोते तो वे उन्हें बहला देती थीं। एक दिन सुशीला ने सुदामा से कहा कि आपके बालसखा श्रीकृष्ण अब द्वारका के राजा हैं। आप उनके पास जाइए। वे अवश्य हमारी मदद करेंगे। सुदामा पहले तो हिचकिचाए, पर पत्नी के आग्रह पर द्वारका जाने को तैयार हुए। सुशीला ने पड़ोस से माँगकर चार मुट्ठी चावल भेंट के लिए एक पोटली में बाँध दिए। सुदामा फटे-पुराने वस्त्रों में द्वारका पहुँचे।

द्वारपालों ने श्रीकृष्ण को सूचना दी।श्रीकृष्ण सिंहासन छोड़कर नंगे पाँव दौड़े और सुदामा को गले लगा लिया। अपने हाथों से उनके पाँव पखारे, रानियों से पंखा झलवाया। रुक्मिणी जी ने सुदामा का सत्कार किया। कथा व्यास ने कहा कि श्रीकृष्ण ने हँसकर पूछा – “मित्र, भाभी ने मेरे लिए क्या भेजा है?” सुदामा लज्जा से चावल की पोटली छुपाने लगे। श्रीकृष्ण ने छीनकर एक मुट्ठी चावल खाए तो तीनों लोकों की संपदा दे दिया। दूसरी मुट्ठी खाते ही रुक्मिणी ने हाथ पकड़ लिया – “प्रभु, बस! एक मुट्ठी में ही इन्हें सब कुछ मिल गया। सुदामा रातभर द्वारका में रुके पर संकोचवश कुछ माँग न सके। सुबह विदा लेकर घर लौटे। रास्ते भर सोचते रहे कि कृष्ण ने कुछ दिया नहीं, चलो अच्छा हुआ।

धन होता तो मैं भगवान को भूल जाता। पर घर पहुँचकर देखा तो झोपड़ी की जगह महल बना था। पत्नी दिव्य वस्त्र-आभूषणों में थीं। चारों ओर वैभव था। सुदामा समझ गए कि यह कृष्ण की कृपा है। उन्होंने कुछ भी नहीं माँगा था, फिर भी भगवान ने सब दे दिया। सुदामा ने धन का सदुपयोग किया और जीवनभर भक्ति में लीन रहे।

भगवान श्रीकृष्ण स्वधाम गमन की कथा सुनाते हुए व्यास ने कहा कि श्रीमद् भागवत के 11वें स्कंध में इसका वर्णन है। द्वारका में यदुवंशी बहुत बलशाली और ऐश्वर्यशाली हो गए थे। उन्हें अपनी शक्ति का अहंकार हो गया। श्रीकृष्ण ने देखा कि पृथ्वी का भार तो हल्का हो गया, पर अब यदुवंशियों का नाश जरूरी है, नहीं तो ये ही पृथ्वी पर भार बन जाएँगे।
एक दिन कुछ यदुवंशी कुमारों ने दुर्वासा आदि ऋषियों का अपमान किया।

साम्ब को स्त्री वेष में सजाकर ऋषियों से पूछा यह गर्भवती है इसके पुत्र होगा या पुत्री? ऋषियों ने क्रोध में श्राप दिया कि इसके पेट से एक मूसल पैदा होगा जो तुम्हारे कुल का नाश करेगा। व्यास ने कहा कि साम्ब के पेट से लोहे का मूसल निकला। उग्रसेन ने उसे चूर-चूर करके समुद्र में फेंकवा दिया। उस चूरे से समुद्र तट पर एरक घास उग आई। मूसल का एक टुकड़ा एक मछली निगल गई। उस मछली को एक बहेलिए ने पकड़ा। उसने मूसल के टुकड़े से अपने बाण की नोक बना ली।

श्रीकृष्ण ने द्वारका वासियों को प्रभास क्षेत्र जाने का आदेश दिया। वहाँ सब यदुवंशी मदिरा पान करके आपस में लड़ने लगे। एरक घास ही मूसल बनकर एक-दूसरे पर प्रहार करने लगी। श्रीकृष्ण और बलराम के देखते-देखते पूरा यदुवंश नष्ट हो गया। बलराम जी समुद्र तट पर जाकर योग समाधि में लीन हो गए और शेषनाग के रूप में समुद्र में प्रवेश कर गए। उधर भगवान श्रीकृष्ण एक पीपल के वृक्ष के नीचे बाएँ पैर पर दाहिना पैर रखकर लेटे थे। उनके चरण का तलवा कमल जैसा चमक रहा था। जरा नाम के बहेलिए ने दूर से उसे हिरण का मुख समझकर वही मूसल वाला बाण चला दिया। बाण श्रीकृष्ण के तलवे में लगा।

बहेलिया पास आकर बहुत पछताया। श्रीकृष्ण ने उसे अभय दान दिया और कहा कि यह सब मेरी ही इच्छा से हुआ है। तुम स्वर्ग जाओ। फिर श्रीकृष्ण ने अपना पार्थिव शरीर त्याग दिया और अपने नित्य धाम गोलोक को चले गए। उसी समय द्वारका समुद्र में डूब गई। अर्जुन द्वारका आए और श्रीकृष्ण की रानियों व बचे हुए लोगों को हस्तिनापुर ले गए। श्री शुक्ल ने कहा कि भगवान का अवतार कार्य पूरा होने पर वे अपने धाम लौट जाते हैं।

उनके जन्म-कर्म दिव्य हैं। जो इस कथा को सुनता है वह भगवान के परम धाम को प्राप्त होता है। कहा कि सुदामा चरित्र सुनने से दरिद्रता दूर होती है और श्रीकृष्ण स्वधाम गमन कथा सुनने से मोक्ष प्राप्त होता है।

इस दौरान पंडित चंद्र शेखर तिवारी, पूर्व प्रधान शिव नारायण पाण्डेय, बृज किशोर शुक्ल, सभासद प्रतिनिधि रमाकांत पांडेय, सुरेंद्र प्रताप नारायण पाण्डेय, सुधाकर पाण्डेय, बेनीमाधव तिवारी, राघवेंद्र पाण्डेय, बालेंद्र भूषण पाण्डेय, गंगेश शुक्ल, गिरजेश पाण्डेय डॉक्टर, देवी सेवक पाण्डेय, ब्रह्मानंद पाण्डेय, दयानंद पाण्डेय, आशीष पाण्डेय, सचिन, बिपिन, बटुकनाथ पाण्डेय, अच्युतानंद पाण्डेय, प्रफुल्ल, राघवेंद्र पाण्डेय, राघव राम पाण्डेय, सियाराम पाण्डेय, एडवोकेट श्यामाकांत पाण्डेय, सीताराम शरण पांडेय, दिलीप, मोहित, रोहित, नागेश पांडेय, नीशू, पूजा, कृष्ण कुमारी, प्रीती, अन्नू सहित तमाम श्रोता मौजूद रहे।

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