नेताजी सुभाष चंद्र बोस आते थे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम आसरे शुक्ल से मिलने

∆∆••• गौर ब्लॉक के सिकटा में एक ही परिवार के दो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सुभाष चन्द्र बोस की तरह यह भी हो गए गुमनाम

बस्ती

जनपद के विकास खंड गौर के सिकटा गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम आसरे शुक्ल से मिलने नेताजी सुभाष चंद्र बोस खुद चलकर आते थे। यही नहीं सेनानी शुक्ल ने नेताजी को 40 युवाओं की एक भरोसेमंद व लड़ाकू टुकड़ी भी भेंट किया था।

फोटो- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्व.राम आसरे शुक्ल 

हर्रैया तहसील के सिकटा गांव में स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम आसरे शुक्ल अंग्रेजों के खिलाफ देशभक्तों की अगुवाई करते थे। वह युवाओं को प्रशिक्षित कर आजादी की लड़ाई को तेज व गतिशील रखते थे। शुक्ल उस समय कांग्रेस कौमी सेवादार के जिला कप्तान भी थे। पुरातत्ववेत्ता व एसआर पीजी कॉलेज दसिया-रुधौली के प्राचार्य डॉ.वीरेंद्र श्रीवास्तव की पुस्तक ‘स्वतंत्रता संग्राम में बस्ती मंडल का योगदान’ के अनुसार एक समय ऐसा आया जब अंग्रेजी सरकार ने उन्हें जेल में बंद किया तो वह जेल से ही आंदोलन चलाने को मजबूर हो गए। ब्रिटानिया हुकूमत को जब पता चला तो उन्हें गोंडा जेल में डाल दिया। यहां जेलर का रवैया इनके प्रति सहानुभूतिपूर्ण रहा। जिससे सेनानियों का उत्पीड़न कुछ कम हो गया।

14 महीने बाद जब वह रिहा हुए तो वर्ष 1941-42 में टिनिच के पास बेलवाडाड़ी में गांधी चौकी स्थापित किया और ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ को हवा दे दिया। जुलाई 1902 में जन्म लेने वाले शुक्ल ने 111 वर्ष की जीवन यात्रा पूरी करने के बाद 20 दिसंबर 2013 को देह त्याग दिया। आजादी की लड़ाई में इन्हें जहां लोग कप्तान साहब कहते थे तो वहीं आजादी मिलने पर इन्होंने राजनीति से सन्यास ले लिया और योग व धर्म का प्रचार करने लगे। जिसके कारण योगी बाबा के नाम से मशहूर हो गए।

तपोस्थली पर पसरा रहता है सन्नाटा

सेनानी शुक्ल की समाधि इनकी ही तपोस्थली सिकटा में बनी हुई है, जहां पहले जिला प्रशासन के निर्देश पर हर राष्ट्रीय पर्व पर तहसील व ब्लॉक स्तरीय अधिकारी आकर श्रद्धांजलि देते थे, वहीं अब यहां हर समय सन्नाटा पसरा रहता है। इनके सुपुत्र नगर पालिका परिषद बस्ती के कर्मचारी नेता सत्यदेव शुक्ल बताते हैं कि सूबे के प्रथम मुख्यमंत्री पंडित गोविंद बल्लभ पंत नें पिताजी को विशिष्ट पद के लिए आमंत्रित किया था लेकिन उन्होंने अस्वीकार कर दिया था। जबकि तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी व मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था

शहर के आवास विकास के गेट पर था सेनानी का नाम

पूर्व विधायक दयाराम चौधरी ने शहर के आवास विकास कॉलोनी में सीमेंटेड गेट बनवाकर सेनानी राम आसरे शुक्ल का नाम लिखवा दिया था। जबकि इधर बड़ेवन-कंपनीबाग के चौड़ीकरण के लिए उसे भी धराशायी कर दिया गया। इससे वह नाम भी मिट गया। वहीं अन्य किसी भी राजनैतिक हस्ती को उनका नाम भी याद नहीं है।

चाचा से सीखे थे अंग्रेजों से लोहा लेने के गुर

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राम आसरे शुक्ल के चाचा पं. राम सुख शुक्ल ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। उनकी देखरेख में राम आसरे ने जहां कई जेल यात्राएं किया, वहीं बहुत सारे जंग लड़ने के तौर-तरीके भी सीख लिए थे। दोनों स्वतंत्रता सेनानी गोंडा के जेल में एक साथ 14 महीने नजरबंद भी रहे। जबकि इस समय दोनों ही नेता सुभाष चन्द्र बोस की तरह आज भी गुमनाम हो गये हैं।

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