अजीत पार्थ न्यूज एजेंसी
वैसे तो काशी में स्थित हर नदी, कुंड,तालाब को जलतीर्थ की मान्यता प्राप्त है। इनका हर गोता पुण्य फलदायी है। लेकिन एक खास दिन लोलार्क कुंड में श्रद्धालुओं की डुबकी सिर्फ किसी पुण्य की ही डुबकी नहीं बल्कि आस्था और विश्वास की डुबकी है। जाहिर है जब लोलार्क षष्ठी को यहां कामनाओं की गागर लेकर अपार जनसागर उमड़ता है तो यह पता चलता है कि इनमें हजारों ऐसे हैं जो मनोकामना पूर्ण होने के बाद आभार की डुबकी लगाने यहां पर आए हैं। काशी के अधिकतम परिवारों में नवप्रवेशी बधुओं के लिए यह एक पारंपरिक संस्कार जैसा है।
आस्था की यह कहानी १८ वीं सदी की एक घटना से जुड़ती है। जिसमें पश्चिम बंगाल के कूचविहार स्टेट के नरेश इस कुंड में स्नान से चर्मरोग से निरोग हुए और वह घटना आस्था की एक संबल बन गई। वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार वाराणसी के भदैनी मोहल्ले में अवस्थित लोलार्क कुंड की रचना इस तांत्रिक विधि से की गई है। एक खास तिथि को सूर्य की किरणें अत्यंत प्रभावी बन जाती हैं,और इसीलिए यहां एक विधान में फल में सूईयां चुभोईं जाती है। वह सूर्य की रश्मियों का प्रतीक है।
उल्लेखनीय है कि दुनिया के प्राचीन मोहल्लों में शुमार गोस्वामी तुलसीदास की तपोस्थली वाराणसी के भदैनी मोहल्ला कभी क्राउंन प्रिंसों का इलाका रहा है। इस मोहल्ले में काशी नरेश,राजा विजयानगरम् , महाराज सरगुजा, महाराज भिनगा, महाराज धौमानगंज और कूचविहार नरेश यहां निवास करते थे। लोलार्क कुंड सूर्य का कुंड है। मान्यता यह भी है कि सूर्य के रथ का पहिया कभी यहीं पर गिरा था जो कुंड के रुप में विख्यात हुआ।
कालांतर में यह लोकमान्यता हो गया कि जिसको संतान की उत्पत्ति न हो वह सपत्नीक इस कुंड में स्नान कर लेता है तो उसको संतानोत्पत्ति का लाभ मिलता है। यही कारण है कि प्रति वर्ष भाद्रपद शुक्लपक्ष के षष्ठी को देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले लाखों श्रद्धालु यहां आस्था की डुबकी लगाकर पुण्य कमाकर अपने गंतव्य को रवाना होते हैं।